मौर्यकाल में राज्य की परिकल्पना में वर्ण-व्यवस्था का योगदान : एक ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • सोनी कुमारी इतिहास विभाग, बी० एन० एम० कॉलेज, बड़हिया, टी० एम० बी० यू० भागलपुर Author
  • डा० आशुतोष कुमार इतिहास विभाग, बी० एन० एम० कॉलेज, बड़हिया, टी० एम० बी० यू० भागलपुर Author

DOI:

https://doi.org/10.59436/ijpsr.v2i2.hin10.3139-342X

Keywords:

मौर्य साम्राज्य, राज्य की परिकल्पना, वर्ण-व्यवस्था, अर्थशास्त्र, कौटिल्य, अशोक, धम्म, सामाजिक संगठन, राजसत्ता, प्राचीन भारत

Abstract

मौर्य साम्राज्य प्राचीन भारतीय इतिहास में राज्य.निर्माणए प्रशासनिक केंद्रीकरणए आर्थिक संगठन और सामाजिक संरचना के विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करता है। सामान्यतः मौर्यकालीन राज्य की चर्चा चन्द्रगुप्त मौर्यए कौटिल्य के अर्थशास्त्रए अशोक की धम्म.नीतिए विशाल नौकरशाहीए कर.व्यवस्था और सैन्य संगठन के संदर्भ में की जाती हैय किंतु राज्य की वैचारिक तथा सामाजिक आधारभूमि के रूप में वर्ण.व्यवस्था की भूमिका पर अपेक्षाकृत कम समेकित ध्यान दिया गया है। प्रस्तुत शोध.पत्र का उद्देश्य मौर्यकालीन राज्य की परिकल्पना और उसके संस्थागत स्वरूप में वर्ण.व्यवस्था के योगदान का ऐतिहासिक.विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। इस अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि मौर्यकाल में वर्ण-व्यवस्था को केवल एक धार्मिक-सामाजिक वर्गीकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सामाजिक कर्तव्यों, पेशागत विभाजन, राजकीय वैधता, न्यायिक व्यवहार, पारिवारिक संबंधों, राजकीय संरक्षण तथा आर्थिक उत्पादन के संगठन से जुड़ी एक व्यापक वैचारिक संरचना थी। अर्थशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए निर्धारित कर्तव्यों का वर्णन राज्य के आर्थिक, सैन्य, धार्मिक और प्रशासनिक कार्यों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है। ब्राह्मणों को ज्ञान, यज्ञ और वैधानिक-धार्मिक प्रतिष्ठा से; क्षत्रियों को शासन, युद्ध और संरक्षण से; वैश्यों को कृषि, पशुपालन और व्यापार से तथा शूद्रों को सेवा, कृषि, पशुपालन, व्यापार और शिल्प से जोड़ना राज्य की कार्यात्मक संरचना के लिए एक सामाजिक आधार प्रदान करता था। हालाँकि, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मौर्य साम्राज्य पूरी तरह वर्ण-व्यवस्था द्वारा संचालित राज्य था। मेगस्थनीज द्वारा वर्णित सात सामाजिक समूहों का वर्गीकरण चार वर्णों से भिन्न है और यह संकेत करता है कि वास्तविक सामाजिक जीवन को केवल ब्राह्मण–क्षत्रिय–वैश्य–शूद्र के आदर्श मॉडल में समाहित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अशोक के अभिलेखों में राज्य की नैतिकता का आधार केवल वर्णधर्म न होकर ‘धम्म’ है, जिसमें माता-पिता की सेवा, प्राणियों के प्रति दया, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति सम्मान, संयम तथा धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया है। अतः मौर्य राज्य को समझने के लिए ब्राह्मणीय वर्ण-आदर्श, राजकीय व्यवहार, आर्थिक परिवर्तन और श्रमण परंपराओं के बीच अंतःक्रिया को समझना आवश्यक है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि वर्ण-व्यवस्था ने मौर्य राज्य की परिकल्पना को तीन प्रमुख स्तरों पर प्रभावित किया—पहला, सामाजिक भूमिकाओं और कर्तव्यों का वैचारिक निर्धारण; दूसरा, शासन और न्याय के लिए सामाजिक श्रेणियों का संस्थागत उपयोग; और तीसरा, कृषि, व्यापार, शिल्प तथा राजस्व-संग्रह के लिए श्रम और उत्पादन का सामाजिक संगठन। इसके साथ ही मौर्य राज्य की व्यापकता ने स्वयं वर्ण-आदर्श को चुनौती भी दी, क्योंकि साम्राज्य में अनेक जनजातीय, क्षेत्रीय, पेशागत और धार्मिक समुदाय सम्मिलित थे। इसलिए मौर्यकालीन राज्य को वर्ण-आधारित राज्य कहने की अपेक्षा ऐसा राज्य कहना अधिक उपयुक्त है जिसने प्रचलित सामाजिक श्रेणियों और वर्ण-वैचारिकी का उपयोग करते हुए एक व्यापक, बहुस्तरीय और केंद्रीकृत राजसत्ता निर्मित की।

References

कौटिल्य। (1960–1965)। कौटिलीय अर्थशास्त्र (आर. पी. कांगले, सं./अनु., खंड 1–3)। मुंबई विश्वविद्यालय।

अशोक। (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी)। अशोक के शिलालेख एवं स्तंभलेख। विभिन्न अभिलेखीय संकलनों में उपलब्ध।

धम्मिका, एस. (1993)। राजा अशोक के अभिलेख: एक अंग्रेज़ी रूपांतरण। कैंडी: बौद्ध प्रकाशन सोसायटी।

मेगस्थनीज। (प्राचीन काल)। इंडिका। मेगस्थनीज के मूल ग्रंथ के उपलब्ध अंश स्ट्रैबो, एरियन तथा अन्य यूनानी-रोमन लेखकों के उद्धरणों में संरक्षित हैं।

अक्तोर, एम. (2017)। सामाजिक वर्ग: वर्ण। पी. ओलिवेल एवं डी. आर. डेविस (सं.), हिंदू धर्म का ऑक्सफोर्ड इतिहास: हिंदू विधि—धर्मशास्त्र का एक नया इतिहास में। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

बाशम, ए. एल. (1954)। भारत वह अद्भुत देश था: मुस्लिम आगमन से पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास एवं संस्कृति का अध्ययन। लंदन: सिड्जविक एंड जैक्सन।

झा, डी. एन. (1998)। प्राचीन भारत: एक ऐतिहासिक रूपरेखा। नई दिल्ली: मनोहर।

कांगले, आर. पी. (1960–1965)। कौटिलीय अर्थशास्त्र का अध्ययन (खंड 1–3)। मुंबई: मुंबई विश्वविद्यालय।

ओलिवेल, पी. (1993)। आश्रम व्यवस्था: एक धार्मिक संस्था का इतिहास और व्याख्याशास्त्र। ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

शर्मा, आर. एस. (1983)। प्राचीन भारत में भौतिक संस्कृति और सामाजिक संरचनाएँ। नई दिल्ली: मैकमिलन।

सिंह, उपिंदर। (2008)। प्राचीन एवं आरंभिक मध्यकालीन भारत का इतिहास: पाषाण युग से 12वीं शताब्दी तक। नई दिल्ली: पियर्सन।

थापर, रोमिला। (1997)। अशोक और मौर्यों का पतन (तीसरा संस्करण)। नई दिल्ली: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

ट्रॉटमैन, थॉमस आर. (1971)। कौटिल्य और अर्थशास्त्र: भारत के बौद्धिक इतिहास पर एक निबंध। लीडेन: ब्रिल।

थापर, रोमिला। (1997)। अशोक और मौर्यों का पतन (Aśoka and the Decline of the Mauryas, 3rd ed.)। नई दिल्ली: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

Published

2026-06-26

How to Cite

सोनी कुमारी, & डा० आशुतोष कुमार. (2026). मौर्यकाल में राज्य की परिकल्पना में वर्ण-व्यवस्था का योगदान : एक ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक अध्ययन . International Journal of Primary and Secondary Research (IJPSR), 2(2), 130-138. https://doi.org/10.59436/ijpsr.v2i2.hin10.3139-342X