बृज प्रदेश और नवगठित भारतीय राज्यों में क्षेत्रीय विकास : एक तुलनात्मक अध्ययन

Authors

  • सत्यवीर सिंह राजनीतिशास्त्र विभाग, आर. बी. एस. महाविद्यालय, आगरा Author

DOI:

https://doi.org/10.59436/ijpsr.v2i3.01.hin.3139-342X

Keywords:

बृज प्रदेश, उत्तराखंड विकास, झारखंड विकास, छत्तीसगढ़ विकास, तेलंगाना विकास, भारत के अन्य राज्यों में क्षेत्रीय सीमांकन

Abstract

पृथक् राज्यों के लिए शुरू होने वाले आन्दोलन का अपना इतिहास रहा है। इसका सीधा संबंध संघवाद के विषय में कांग्रेसी समझ से भी था। जिसके आधार पर पृथक राज्य के लिए उठने वाली माँगों को प्रोत्साहित या हतोत्साहित किया गया। कांग्रेस भारत के संघीय स्वरूप के विषय में शुरूआत से ही सहमत थी लेकिन इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति सर्वप्रथम 1916 ई. में हुई जब कांग्रेस ने एक प्रस्ताव के माध्यम से संघवाद को एक मूल गुण के रूप में स्वीकार किया। इसने क्षेत्रीय रूप से पृथक राज्य की माँग को प्रोत्साहित किया। सन् 1922 ई. में कांग्रेस ने भाषा के आधार पर बनने वाले राज्य के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। इसके लिए कांग्रेस पर राष्ट्रीयताओं के लिए काम करने वाले समूहों ने दबाव डालने का काम किया। ये समूह भाषा आधारित राज्यों के लिए पहले से ही प्रयत्नशील थे। 1927 ई0 में भारत सरकार  और भारत के कार्यालयों में उड़िया, कन्नड, आन्ध्र, तमिल, बांग्ला और झारखण्ड से जुड़ी राष्ट्रीयताओं की मान्यता के और भाषा आधारित राज्यों के पुनर्गठन के लिए ज्ञापनों की बाढ़ आ गई। नये राज्यों की माँग को इसी के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। जैसे-जैसे इन आबादियों में दल चेतना बढ़ी, वैसे-वैसे उनमें यह भावना भी आई कि वे मुक्त सामूहिक जीवन व्यतीत करें। ऐसा जीवन जो वर्तमान प्रांतीय सीमाओं और विभाजनों द्वारा अवरूद्ध नहीं हो। ये प्रान्त भाषागत आधार पर नहीं वरन् अंग्रेजों के बढते हुये प्रभाव के युग में प्रशासनिक सुविधा के लिए बने थे। इनमें से कुछ राष्ट्रीय इकाईयों ने जैसे बिहारियों, आन्ध्रवासियों, कर्नाटकवासियों जिनकी अपनी पृथक भाषा और संस्कृति थी, प्रान्तों के पुनर्गठन की माँग की, जिससे वे भूक्षेत्रों की दृष्टि से भी एकीकृत हो जाये।

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Published

2026-09-03

How to Cite

सत्यवीर सिंह. (2026). बृज प्रदेश और नवगठित भारतीय राज्यों में क्षेत्रीय विकास : एक तुलनात्मक अध्ययन. International Journal of Primary and Secondary Research (IJPSR), 2(3), 16-22. https://doi.org/10.59436/ijpsr.v2i3.01.hin.3139-342X